Wednesday, January 31, 2024

बाकी है

चढ़ना है ऊँचे पहाड़ों पर और लगानी है कई लम्बी छलांग हमे 
मिलना है हर पक्षी से और अभी कई पेड़ों का हिसाब बाकी है

जानना है धरती कितनी गोल है और कितना ऊँचा है आसमां 
पूछना है हर पथिक से कि और कितनी राह अभी बाकी है 

देखने हैं सारे मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और कई तो गुरुद्वारे 
सुननी है गूंगो की सारी बातें और मेरी भी कुछ बात अभी बाकी है 

पहुंचना है वहाँ जहाँ कोई अब तलक पहुँच नहीं सका है 
करना है महसूस कि किसमे कितना अभी अपनापन बाकी है

लिखना है धरती ,अंबर और ये सारा नभ संचर 
कितने शमशान में जल गए और कितने जाने अभी बाकी हैं 

मेरे जिस्मों जहन के अभी कुछ ख्वाब बाकी है 
कि मुझे अभी मत मारो अभी मेरी कुछ किताब बाकी है l

Saturday, January 20, 2024

मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ।

कैसे दिन से पहले दिन करती हो माँ 

और सूरज से भी पहले तुम उठती हो माँ

फिर बिना इत्र के घर को महका देती हो माँ 

पूरा घर कैसे अपने इन्हीं हाथों से उठा लेती हो माँ

मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ


कई लोगों से मिला और कइयों से बिछडा मैं माँ

कहीं हारा कहीं कुछ छूटा और फिर खाली हाथ लौटा मैं माँ

खाली हाथ घर आके तुम्हें देख लगा जैसे मैं ही खुदा हूँ माँ

आपका सिर्फ चेहरा ही मानो मेरी जन्नत हो माँ

मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ


कई दफा तुमसे कैसे लिपट कर जोर से रोया मैं माँ

यहां पर लेकिन मैं अकेला नहीं हूँ मेरे साथ एक शब्द है माँ 

कोशिश में हूँ और एक दिन घर लौटूंगा मैं माँ 

और तुम्हारी तरह ही तुमसे लिपटकर तुम्हें ठीक कर दूंगा माँ 

मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ 


अभी भी मेरा मन हर बीमारी में डॉक्टर से पहले तुम्हें याद करता है माँ

माँ सुनो ना मैं थोड़ा सा यहां बीमार हूँ कई ऐसी बीमारियों का

जिनका तुम्हारे सिवा कोई डॉक्टर नहीं और ना ही कोई इलाज माँ 

मेरे बिना ही कुछ किये मुझे राजा बताती हो माँ 

मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ!


पापा की एक आवाज़

गेहुआ रंग और मुझ से थोड़ा सा छोटा कद 
और झुरीयों का स्वागत करते उनके गाल 
पहले से हल्के हाथ और सिकुड़ती उनकी खाल
भले कहूं मैं बेपरवाह या अब अच्छे नहीं है आप 
पापा आपकी ऊंचाई आपकी उम्र में आकर ही समझ आएगी
पापा कई बार मन करता है के डांट के करे कोई आगाज़
पर हां पापा बहुत शुकूं भरी होती है आपकी इक आवाज

हां अभी मैं जवानी के नशे में बुढ़ापे को नहीं समझ पाता
मैं चलता हुं पर आपकी तरह कतई नहीं चल पाता 
पापा कर दो ना मुझे फिर से इतना छोटा के समा जाऊं आपकी बाहों में 
पापा आपकी डांट नीम सी है जो कड़वी है पर बड़ी गुडकारी है 
पापा कई बार मन करता है के डांट के करे कोई आगाज़
पर हां पापा बहुत शुकूं भरी होती है आपकी इक आवाज
-नीरज 

शहर आज परेशान है

ये शहर आज परेशान सा क्यूं है 
शायद इसे याद आया हो कुछ अतीत
वो पहले की हवा वो चिड़ियों की मधुर आवाज
लह लहाती सरसों दूर-दूर तक हरियाली 
शायद शहर का गम बड़े मकान में 
और इन बड़ी चौड़ी सड़कों में दफ्न हो 
मनो ये शहर आज परेशान है 

ये शहर आज परेशान सा क्यूं है 
शायद इसे याद आया हो कुछ अतीत
वो गांव की कच्ची सड़के कच्चे मकान
वो पीपल, बरगद और नीम पे पड़ा झूला 
और वो जुगनू की चमक और शियारो का हुय्याना 
शायद शहर का गम इन लप-लपाती लाइटों में दफ्न हो 
मानो ये शहर आज परेशान है

 ये शहर आज परेशान सा क्यूं है 
शायद इसे याद आया हो कुछ अतीत
वो बारिश के बाद मिट्टी का महकना और चाहंटा
रात से पहले सबका सो जाना और कुत्ते बिल्लियों का पहरा
शायद शहर का गम गलियों के बड़े दरवाजों व उन पर खड़े
पहरेदारों और बारिश के बाद चम चमकती नई सड़कों में दफन हो
मानो ये शहर आज परेशान है।
-नीरज 

बस अब बहोत हुआ

कहां गई समझ तुम्हारी कहां गए वो तारे 
वो बातें जिनका दीवारों तक पर होता था असर
खुद को तोड़ना यूं रोज-रोज अक्हुच्छ हुआ 
जो हुआ सो हुआ मानो बस अब बहोत हुआ

हनुमत वीर अपनी शक्ति अब पहचानो 
अपनी दिशा में थोड़ा और उजाला अब डालो 
जरा सा अंधेरा था ए अब सब उजियाला कर डालो 
जो हुआ सो हुआ मानो बस अब बहोत हुआ

मरे तो मर जाए ये सारा जहां तुम में,तुम तो हो
अगर नहीं तो फिर ढूंढो और इंसा तो बनावो
अब इस बात का चिंतन बहुत हुआ
जो हुआ सो हुआ मानो बस अब बहोत हुआ।
-नीरज 

वो फूल नहीं कांटे थे

जो बीत गए हम और हो गए हमारा कल 
और जिन रातों ने शुकुं से हमें सोने ना दिया कल 
और दिन में खूब उदासी का दफन बने थे 
जो बीत गए ऐसे लम्हे वो फूल नहीं कांटे थे 

कांटों से इतना प्रेम ही क्यों जब चुभना उनका कर्म 
हां जब जन्म लिया था कांटों ने तब थे वो बड़े नर्म 
नरमी बाद बने सख्त जो वही हाथ चरते थे
जो बीत गए ऐसे लम्हे वो फूल नहीं कांटे थे 

वृक्ष में फूलों से पहले अक्सर ही कांटे आते हैं 
भला उन कांटों के चक्कर में हम फूल क्यूं भूलाते हैं 
फूल हो फूल से जियो ना कि वो जो झाड़ी थे
जो बीत गए ऐसे लम्हे वो फूल नहीं कांटे थे 

खुद को उनसे निकाल कर लाना और नए होना
देखना पुखराज हीरे हो और हीरे को पाना
टूटे गिलास टूटे तारे इनके कहां इतने चिंतन थे
जो बीत गए ऐसे लम्हे वो फूल नहीं कांटे थे 

अब फूलों की बारी है और फेंको इन कांटों की झड़ी को
सुगंध लो दिल जीत लो और फेंक दो उन झाड़ी को
वो तुम्हें झुकाते गिराते रुलाते और गिड गिडवाते थे
जो बीत गए ऐसे लम्हे वो फूल नहीं कांटे थे 

कहीं गई तुम्हारी सुंदरता या चंचलता क्या 
या अंत हुआ उस तेज का जिस पर था तुमको नाज़
चिल्लाओ उठाओ भगाओ उन्हें जो तुम्हें डुबोते थे
जो बीत गए ऐसे लम्हे वह फूल नहीं काटे थे 

मुस्कुराओ और चमको है धरती के राज पुत्र
ए जग सारा का सारा तुम्हारा है और तुम ही हो इसके पुत्र
महको जग महकेगा तुम थे ईश्वर वो नश्वर थे 
जो बीत गए ऐसे लम्हे वो फूल नहीं कांटे थे।
-नीरज

अब हम हम हो जाते है।

क्या हुआ अगर आज तेरे घर की छत पर उजाला नहीं
क्या हुआ अगर आज तेरे घर की रसोई में निवाला नहीं
बस तनिक तनिक हिम्मत से दृढ़ तुंग भी हट जाते हैं 
चलो अब अपनी परवरिश के लिए हम हम हो जाते हैं 

क्या हुआ अगर समय तेरा समावेश नहीं 
क्या हुआ अगर तेरा कोई परिवेश नहीं 
सैंकेंडो की सुई से सिखो क्षण क्षण पुरे घंटे बन जाते हैं 
कब तक यूं इतराओगे चलो अब हम हम हो जाते हैं

क्या हुआ अगर तुझ पर किसी का हाथ नहीं 
क्या हुआ अगर बज उड़ा बिन बारात नहीं 
धीरे-धीरे बस रुकना नहीं रास्ते अपने आप खत्म हो जाते हैं
मिलेगा यह कतरा दरिया में तो चलो हम हम हो जाते हैं।
-नीरज 

बस एक कदम और

चलिए ना मत ठहरिए सच में ठहरना ठीक नहीं
हे नभ संचर से शक्तिशाली हे हिमनिद्र
तुम्हीं अर्जुन के गांडीव, हे शिव के कोदंड को 
तोड़ने वाले राम बस एक कदम और।

चलिए ना मत ठहरिए सच में ठहरना ठीक नहीं
चलते रहो और लिखते रहो और रखो याद इतिहास
हे सम्राट से विजेता और हे अंग्रेजों को 
भगाने वाले गांधी बस एक कदम और

चलिए ना मत ठहरिए सच में ठहरना ठीक नहीं 
गढ़ते रहो खुद में मोती और तरासो हीरे
हे चाणक्य के चंद्रगुप्त हे भारतवर्ष के
सम्राट बस एक कदम और

चलिए ना मत ठहरिए सच में ठहरना ठीक नहीं
खुद को जानो पहचानो हे हनुमान खुद ही बानो
खुद के जामवंत और कर दो पार
ऐ विशाल समुद्र बस एक कदम और ।
- नीरज 

Friday, January 19, 2024

रातें जागी है तो कहानियां तो बनेंगी

ना घबरा ना डर अब चल उठ वीर किस्मत तो चमकेगी
रोशनी अब सूर्य से ही नहीं चंदा से भी निकलेगी 
जिन जड़ों में जकडा है तू वही तेरी जफर की विशात देंगी 
क्या कहते हैं वो ना सुन तूने रातें जागी हैं तो कहानियां तो बनेंगी 

रिश्ते नाते यार व्यवहार सब की हिकमत बदलेगी 
मां वही फिर बचपन की लोरियां गढ़ेगी 
पिताजी की अंधरी दुनिया रोशनी में तब बदलेगी 
क्या कहते हैं वो ना सुन तूने रातें जागी हैं तो कहानियां तो बनेंगी 

जो खड़े हैं बाजार में बताते तेरे किरदार को
दे इन्हें सहलाने की चोट हो जोरदार जो
बदले पछतावे की नहीं ये वो जो जग में झलकेगी 
क्या कहते हैं वो ना सुन तूने रातें जागी हैं तो कहानियां तो बनेंगी ।
-नीरज 

क्या-क्या बताऊं

मेरी समता बताऊँ या मेरी विषमता बताऊँ

मेरी सफलता बताऊँ या मेरी विफलता बताऊँ

मेरे टूटे हुए सपने बताऊँ या पूरे हुए ख्वाब बताऊँ

बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ  


मेरी नादानियां बताऊँ या मेरी चालाकियां बताऊँ

मेरी समझदारियां बताऊँ या मेरी बेवकूफियां बताऊँ 

मेरे कुछ दोस्त बताऊँ या मेरे कुछ दुश्मन बताऊँ 

बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ  


मेरे उजले दिन बताऊँ या मेरी काली रातें बताऊँ

मेरा कुछ डर बताऊँ या मेरी कुछ ताकत बताऊँ

मेरा हंसना बताऊँ या मेरा रोना बताऊँ

बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ  


मेरी लिखावट बताऊँ या जो लिख नहीं सका वो बताऊँ

मेरी पढ़ी-लिखी इलम बताऊँ या जो पढूंगा वो बताऊँ

मेरे कुछ अच्छे रंग बताऊँ या मेरे कुछ बुरे ढंग बताऊँ

बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ ।

-नीरज 

Thursday, January 18, 2024

मेरे गांव की वो सड़क

सवेरे सवेरे उठ कर दिखती थी जो सड़क 

जोड़ती थी मेरे घर को बड़ी सड़क से वो सड़क

कहीं ठीक तो कहीं जरा सी टूटी-फूटी वो सड़क

ज्यादा चौड़ी नहीं ना ज्यादा छोटी है वो  सड़क

आखिर कैसी भी है याद आती है मेरे गांव की वो सड़क


कुछ दूर चला जाता था तब भी घर दिखाती वो सड़क 

मैं कहीं ठहर जाता तो धूप से मुझे बचाती वो सड़क

पेड़ों से घिरी खेतों किनारे, घांसो से भरी वो सड़क 

ज्यादा चौड़ी नहीं ना ज्यादा छोटी है वो सड़क

आखिर कैसी भी है याद आती है मेरे गांव की वो सड़क


मेरे घर अक्सर खुशियां लाती है वो सड़क

मासी बुआ नाना नानी सबको घर लाती है वो सड़क 

दिवाली की मिठाई होली के रंग, राखी पे राखी लाती है वो सड़क

ज्यादा चौड़ी नहीं ना ज्यादा छोटी है वो सड़क

आखिर कैसी भी है याद आती है मेरे गांव की वो सड़क

-नीरज 




Sunday, October 16, 2022

आज हम फिर भूखे सो जाएंगे !

 दिन कुछ यूँ शुरू हुआ 

प्रातः लालिमा सूर्य की ललछर कर बैठी शहर 

कहीं चाय की चुस्की 

कहीं प्लेटों में भरा है जमके नाश्ता 

पर ये  क्या 

निकल पड़े क्यों कुछ छोटे-छोटे बच्चे 

लेकर बड़े-बड़े थैले 


मेरा भी दिन चाय की चुस्की से शुरू हुआ 

फिर यूं मेरी चाय छोड़ दी मैंने 

और उन बड़े-बड़े बोरे लिए बच्चों के आगे डट गया 

पूछा कहां को चले 

आवाज आई जाने दो भैया नहीं तो 

आज हम फिर भूखे सो जाएंगे 


हाँ अब सूर्य खिल गया 

कोई दफ्तर कोई विद्यालय 

कहीं कहीं कोई कोई निकल गया 

मैं फिराक में अभी रास्ते में रुक रहा 

बड़े-बड़े थैले लिए वो बच्चे 

सूर्य की भांति लौट पड़े 


बोरी में वजन काफी था 

न जाने क्या था क्या उसमें बाकी था 

फिर रोकने की चाह से रोका उनको 

सूर्य की धूप ने उन सूर्य का 

हौसला बढ़ा दिया था 

शायद मेरे प्रश्नों का उत्तर था 

अब पूछ लो भैया अब हम 

आज भूखे नहीं सो पाएंगे 


मेरे प्रश्न का उत्तर मुझे मिल चुका था 

कुछ दूर उन थैलो को पहुँचाने की मांग थी मेरी 

वो दो ने मानी तीन ने ठुकरा दी 

आखिर  मैं जीता उन विजयी रणधारों से 

दो का थैला बस कुछ कदम ले चल 

मैं थक गया 

शायद मेरी चाय और मेरा महंगा खाना 

मुझे जवाब दे रहे हो 


कब तक ऐ बच्चे यूँ बोरे उठाएंगे 

जो बस्तो से भारी बोरा है वो  कहां तक ले जाएंगे

अच्छा सूर्य तुम तो मेरे मित्र हो 

मुझे समझाओ 

तुम्हारी किरण इनको रोशन नहीं करती 

कर दो इन बोरो का वजन कम 

ऐ सूर्य नहीं तो ऐ आज फिर भूखे सो जाएंगे!

-नीरज 

आओ अब मेहनत करते हैं

 उठकर जो देखा मैंने सबसे पहले मेरी बूढ़ी मां को प्रातः में

पिछले दिन की खूब थकावट और फिर भी नहीं दिखी बिस्तर में 

और मेरे पिताजी प्रातः उठे विकराल कमर का दर्द लिए 

फिर कार्यालय जाने को कमर दर्द के साथ तैयार दिखे 

कैसे ए मेरी धरती और मेरा आसमाँ दिन भर चलते हैं 

हां अब मेरी बारी आओ अब मेहनत करते हैं 


फिर दिखा सूर्य मतवाला बादलों में चमाचम निकलता आता 

कल जो लौटा था संध्या को बुझ बुझ छुपता  जाता 

तभी दिखी गौरैया मुंह में लिए हुए इक बड़ा सा दाना 

कैसे जाएगी घर को लेकर यह बच्चों के लिए ये खाना 

कैसे यह मेरा यार और मेरी सहेली दिन भर सवंरते हैं 

हां मेरी बारी आओ मेहनत अब करते हैं 


नहा धोकर निकला जो मैं, मुझे दिखा थैला  टांगे छोटू 

उम्र वहीं आठ-नौ साल पर थैला था खूब भरा बसेतू 

तभी दिखी इक गुड़िया पतली सी रस्सी पर चलती 

छोटे छोटे पांव थे जिसके आखिर कैसे ए करतब करती 

कैसे यह मेरी गुड़िया और मेरा छोटू दिनभर विचरते हैं 

हां अब मेरी बारी आओ अब मेहनत करते हैं 


बैठा जो रिक्शे में देखा रिक्शेवाले कतई बूढ़े दादा को जैसे पतंगे 

उम्र करीबन 80 फिर भी ए  मुझे बस अड्डे पहुंचा देंगे 

तभी दिखी इक बूढ़ी मां लेकर जाती फूलों का भारी टोकरा 

झुक कर  चलती और फूलों की माला बेचती ये करती सवेरा

कैसे ए  मेरी बूढ़ी अम्मा और बूढ़े दादा दिन भर खटते हैं 

हां अब मेरी बारी आओ अब मेहनत करते हैं !

-नीरज 

Monday, August 29, 2022

युद्ध अभी जारी है

 हां अंधेरा है घना और रातें अत्यंत ही काली 

प्रातः सूर्य उगेगा बादल चमकेगा धूप भी होगी मतवाली 

और फिर संध्या को सूर्य का ढ़लना बरकारी है 

थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है 


हजारों चेहरे और उनके लाखों सवाल और ये कटु बोली 

फिर उनकी तारीफे और सराहना करना जैसे होली की रंगोली 

अंधेरा फिर रात और जुगनू से कहते सुनना अब हमारी बारी है 

थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध अभी जारी है


पत्तों का मुरझाना फिर नीचे गिर जाना और मिट्टी हो जाना 

फिर नए पत्तों का आना और उससे पेड़ों का लह लहाना 

वह मिट्टी हुए पत्तों का पेड़ बनने का प्रयास इस बारी है 

थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध अभी जारी है 


टूटते तड़पाते यह पहाड़ नीचे गिराते रोज पत्थरों को

गिरे हुए पत्थरों का टिला बनना और देखना पहाड़ों को 

उन्हीं तिलों का माउंट बन्ना समझदारी है 

थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है 


चीटियों का भोजन की तलाश में कोसों दूर तक जाना 

पहाड़ों में चढ़ते चढ़ते फिसल फिसल कर नीचे आना 

वापस इन को देखो पहाड़ों पर चढ़ना अभी जारी है 

थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है 


बारिश की बूंदों का धरती पर आकाश से गिरना 

और धरती से वापस आकाश पर जाना जारी है 

उन बूंदों का धरती पर छुप-छुपकर जगना

थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है 

-नीरज नील 

Sunday, August 28, 2022

आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना

 गिरना, टूटना फिऱ फूठना और चोटिल हो जाना 

और फिर बने रहना हवाओं से लडे जाना

आंधी तूफान बरसात और चक्रवात का आना 

वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !


तड़कना, गड़कना व बादल की गर्जन का आना 

और फिर बने रहना भूकंप से लड़े जाना 

बादलों की बिजली व कभी-कभी ज्वालामुखी का आना

वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !


मैं पर्वत हूं मुझे मेरा हर रोज यह बताना 

और फिर गिट्टीयों व पत्थरों को समझाना 

इंसानी मशीनों में नई तकनीकों का आना

वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !


मैंने रखे हैं कई देव और महादेव को पाना 

और फिर इन नदियों को अपने से निकालना 

नदियों का भयावह रूप इनसे बचे जाना

वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !

-नीरज नील 

जब मैं कविता लिखता हूँ

एकाग्र मन से अब शब्दों में उलझकर शब्दों से खेलता हूँ  शब्दों को पूज्यनीय चिंतनीय मान कर ये चादर बुनता हूँ  खुद को लेकर थोड़ा चिंतित के मै क्य...