Wednesday, January 31, 2024
बाकी है
Saturday, January 20, 2024
मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ।
कैसे दिन से पहले दिन करती हो माँ
और सूरज से भी पहले तुम उठती हो माँ
फिर बिना इत्र के घर को महका देती हो माँ
पूरा घर कैसे अपने इन्हीं हाथों से उठा लेती हो माँ
मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ
कई लोगों से मिला और कइयों से बिछडा मैं माँ
कहीं हारा कहीं कुछ छूटा और फिर खाली हाथ लौटा मैं माँ
खाली हाथ घर आके तुम्हें देख लगा जैसे मैं ही खुदा हूँ माँ
आपका सिर्फ चेहरा ही मानो मेरी जन्नत हो माँ
मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ
कई दफा तुमसे कैसे लिपट कर जोर से रोया मैं माँ
यहां पर लेकिन मैं अकेला नहीं हूँ मेरे साथ एक शब्द है माँ
कोशिश में हूँ और एक दिन घर लौटूंगा मैं माँ
और तुम्हारी तरह ही तुमसे लिपटकर तुम्हें ठीक कर दूंगा माँ
मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ
अभी भी मेरा मन हर बीमारी में डॉक्टर से पहले तुम्हें याद करता है माँ
माँ सुनो ना मैं थोड़ा सा यहां बीमार हूँ कई ऐसी बीमारियों का
जिनका तुम्हारे सिवा कोई डॉक्टर नहीं और ना ही कोई इलाज माँ
मेरे बिना ही कुछ किये मुझे राजा बताती हो माँ
मुझे नहीं बनना कुछ बस मैं चाहता हूँ, तुमसा बनना मेरी माँ!
पापा की एक आवाज़
शहर आज परेशान है
बस अब बहोत हुआ
वो फूल नहीं कांटे थे
अब हम हम हो जाते है।
बस एक कदम और
Friday, January 19, 2024
रातें जागी है तो कहानियां तो बनेंगी
क्या-क्या बताऊं
मेरी समता बताऊँ या मेरी विषमता बताऊँ
मेरी सफलता बताऊँ या मेरी विफलता बताऊँ
मेरे टूटे हुए सपने बताऊँ या पूरे हुए ख्वाब बताऊँ
बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ
मेरी नादानियां बताऊँ या मेरी चालाकियां बताऊँ
मेरी समझदारियां बताऊँ या मेरी बेवकूफियां बताऊँ
मेरे कुछ दोस्त बताऊँ या मेरे कुछ दुश्मन बताऊँ
बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ
मेरे उजले दिन बताऊँ या मेरी काली रातें बताऊँ
मेरा कुछ डर बताऊँ या मेरी कुछ ताकत बताऊँ
मेरा हंसना बताऊँ या मेरा रोना बताऊँ
बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ
मेरी लिखावट बताऊँ या जो लिख नहीं सका वो बताऊँ
मेरी पढ़ी-लिखी इलम बताऊँ या जो पढूंगा वो बताऊँ
मेरे कुछ अच्छे रंग बताऊँ या मेरे कुछ बुरे ढंग बताऊँ
बातों के पिटारों से सोचता हूं तुम्हें क्या-क्या बताऊँ ।
Thursday, January 18, 2024
मेरे गांव की वो सड़क
सवेरे सवेरे उठ कर दिखती थी जो सड़क
जोड़ती थी मेरे घर को बड़ी सड़क से वो सड़क
कहीं ठीक तो कहीं जरा सी टूटी-फूटी वो सड़क
ज्यादा चौड़ी नहीं ना ज्यादा छोटी है वो सड़क
आखिर कैसी भी है याद आती है मेरे गांव की वो सड़क
कुछ दूर चला जाता था तब भी घर दिखाती वो सड़क
मैं कहीं ठहर जाता तो धूप से मुझे बचाती वो सड़क
पेड़ों से घिरी खेतों किनारे, घांसो से भरी वो सड़क
ज्यादा चौड़ी नहीं ना ज्यादा छोटी है वो सड़क
आखिर कैसी भी है याद आती है मेरे गांव की वो सड़क
मेरे घर अक्सर खुशियां लाती है वो सड़क
मासी बुआ नाना नानी सबको घर लाती है वो सड़क
दिवाली की मिठाई होली के रंग, राखी पे राखी लाती है वो सड़क
ज्यादा चौड़ी नहीं ना ज्यादा छोटी है वो सड़क
आखिर कैसी भी है याद आती है मेरे गांव की वो सड़क
-नीरज
Sunday, October 16, 2022
आज हम फिर भूखे सो जाएंगे !
दिन कुछ यूँ शुरू हुआ
प्रातः लालिमा सूर्य की ललछर कर बैठी शहर
कहीं चाय की चुस्की
कहीं प्लेटों में भरा है जमके नाश्ता
पर ये क्या
निकल पड़े क्यों कुछ छोटे-छोटे बच्चे
लेकर बड़े-बड़े थैले
मेरा भी दिन चाय की चुस्की से शुरू हुआ
फिर यूं मेरी चाय छोड़ दी मैंने
और उन बड़े-बड़े बोरे लिए बच्चों के आगे डट गया
पूछा कहां को चले
आवाज आई जाने दो भैया नहीं तो
आज हम फिर भूखे सो जाएंगे
हाँ अब सूर्य खिल गया
कोई दफ्तर कोई विद्यालय
कहीं कहीं कोई कोई निकल गया
मैं फिराक में अभी रास्ते में रुक रहा
बड़े-बड़े थैले लिए वो बच्चे
सूर्य की भांति लौट पड़े
बोरी में वजन काफी था
न जाने क्या था क्या उसमें बाकी था
फिर रोकने की चाह से रोका उनको
सूर्य की धूप ने उन सूर्य का
हौसला बढ़ा दिया था
शायद मेरे प्रश्नों का उत्तर था
अब पूछ लो भैया अब हम
आज भूखे नहीं सो पाएंगे
मेरे प्रश्न का उत्तर मुझे मिल चुका था
कुछ दूर उन थैलो को पहुँचाने की मांग थी मेरी
वो दो ने मानी तीन ने ठुकरा दी
आखिर मैं जीता उन विजयी रणधारों से
दो का थैला बस कुछ कदम ले चल
मैं थक गया
शायद मेरी चाय और मेरा महंगा खाना
मुझे जवाब दे रहे हो
कब तक ऐ बच्चे यूँ बोरे उठाएंगे
जो बस्तो से भारी बोरा है वो कहां तक ले जाएंगे
अच्छा सूर्य तुम तो मेरे मित्र हो
मुझे समझाओ
तुम्हारी किरण इनको रोशन नहीं करती
कर दो इन बोरो का वजन कम
ऐ सूर्य नहीं तो ऐ आज फिर भूखे सो जाएंगे!
-नीरज
आओ अब मेहनत करते हैं
उठकर जो देखा मैंने सबसे पहले मेरी बूढ़ी मां को प्रातः में
पिछले दिन की खूब थकावट और फिर भी नहीं दिखी बिस्तर में
और मेरे पिताजी प्रातः उठे विकराल कमर का दर्द लिए
फिर कार्यालय जाने को कमर दर्द के साथ तैयार दिखे
कैसे ए मेरी धरती और मेरा आसमाँ दिन भर चलते हैं
हां अब मेरी बारी आओ अब मेहनत करते हैं
फिर दिखा सूर्य मतवाला बादलों में चमाचम निकलता आता
कल जो लौटा था संध्या को बुझ बुझ छुपता जाता
तभी दिखी गौरैया मुंह में लिए हुए इक बड़ा सा दाना
कैसे जाएगी घर को लेकर यह बच्चों के लिए ये खाना
कैसे यह मेरा यार और मेरी सहेली दिन भर सवंरते हैं
हां मेरी बारी आओ मेहनत अब करते हैं
नहा धोकर निकला जो मैं, मुझे दिखा थैला टांगे छोटू
उम्र वहीं आठ-नौ साल पर थैला था खूब भरा बसेतू
तभी दिखी इक गुड़िया पतली सी रस्सी पर चलती
छोटे छोटे पांव थे जिसके आखिर कैसे ए करतब करती
कैसे यह मेरी गुड़िया और मेरा छोटू दिनभर विचरते हैं
हां अब मेरी बारी आओ अब मेहनत करते हैं
बैठा जो रिक्शे में देखा रिक्शेवाले कतई बूढ़े दादा को जैसे पतंगे
उम्र करीबन 80 फिर भी ए मुझे बस अड्डे पहुंचा देंगे
तभी दिखी इक बूढ़ी मां लेकर जाती फूलों का भारी टोकरा
झुक कर चलती और फूलों की माला बेचती ये करती सवेरा
कैसे ए मेरी बूढ़ी अम्मा और बूढ़े दादा दिन भर खटते हैं
हां अब मेरी बारी आओ अब मेहनत करते हैं !
-नीरज
Monday, August 29, 2022
युद्ध अभी जारी है
हां अंधेरा है घना और रातें अत्यंत ही काली
प्रातः सूर्य उगेगा बादल चमकेगा धूप भी होगी मतवाली
और फिर संध्या को सूर्य का ढ़लना बरकारी है
थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है
हजारों चेहरे और उनके लाखों सवाल और ये कटु बोली
फिर उनकी तारीफे और सराहना करना जैसे होली की रंगोली
अंधेरा फिर रात और जुगनू से कहते सुनना अब हमारी बारी है
थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध अभी जारी है
पत्तों का मुरझाना फिर नीचे गिर जाना और मिट्टी हो जाना
फिर नए पत्तों का आना और उससे पेड़ों का लह लहाना
वह मिट्टी हुए पत्तों का पेड़ बनने का प्रयास इस बारी है
थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध अभी जारी है
टूटते तड़पाते यह पहाड़ नीचे गिराते रोज पत्थरों को
गिरे हुए पत्थरों का टिला बनना और देखना पहाड़ों को
उन्हीं तिलों का माउंट बन्ना समझदारी है
थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है
चीटियों का भोजन की तलाश में कोसों दूर तक जाना
पहाड़ों में चढ़ते चढ़ते फिसल फिसल कर नीचे आना
वापस इन को देखो पहाड़ों पर चढ़ना अभी जारी है
थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है
बारिश की बूंदों का धरती पर आकाश से गिरना
और धरती से वापस आकाश पर जाना जारी है
उन बूंदों का धरती पर छुप-छुपकर जगना
थके रुके और फिर चल पड़े क्योंकि युद्ध भी जारी है
-नीरज नील
Sunday, August 28, 2022
आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना
गिरना, टूटना फिऱ फूठना और चोटिल हो जाना
और फिर बने रहना हवाओं से लडे जाना
आंधी तूफान बरसात और चक्रवात का आना
वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !
तड़कना, गड़कना व बादल की गर्जन का आना
और फिर बने रहना भूकंप से लड़े जाना
बादलों की बिजली व कभी-कभी ज्वालामुखी का आना
वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !
मैं पर्वत हूं मुझे मेरा हर रोज यह बताना
और फिर गिट्टीयों व पत्थरों को समझाना
इंसानी मशीनों में नई तकनीकों का आना
वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !
मैंने रखे हैं कई देव और महादेव को पाना
और फिर इन नदियों को अपने से निकालना
नदियों का भयावह रूप इनसे बचे जाना
वास्तव में आसां नहीं कतई पर्वत हो जाना !
-नीरज नील
जब मैं कविता लिखता हूँ
एकाग्र मन से अब शब्दों में उलझकर शब्दों से खेलता हूँ शब्दों को पूज्यनीय चिंतनीय मान कर ये चादर बुनता हूँ खुद को लेकर थोड़ा चिंतित के मै क्य...
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राह देखकर मचल गए अब इतनी भी क्या जल्दी है विजय मिलेगी निश्चित है पर तेरी सोच का क्या जो उलझी है पानी बिलकुल रुकता नहीं देखो पर उसके आगे भ...
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हम अक्सर कहते हैं कि हमें मिला ही क्या है हमें खुदा ने दिया ही क्या है और न जाने कितनी चीजों को लेकर उलझे रहते हैं हम हमारे दुख हमारी नौक...
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उठो क्या अभी तक तुम राह पर नहीं आए देखो इक भंवरा पुष्पो पर प्रभुत प्रभुत भिनभिनाये संध्या तक वो भर देगा शहदो के बड़े पिपिहे सपना सपना न...